सुरत

   सुरत का अर्थ है  आत्मा, आत्मा ईश्वर का अंश है । शरीर एक अणु है अत्मा ईश्वर का पुत्र है । वैग्यनिकों द्वारा आत्मा नमक का एक ढोका है । आत्मा अमर अजर अविनाशी है आत्मा एक प्रकाश पुन्ज है । आत्मा ही पर्मात्मा से मिलती है जब मिलती है तो ब्रह्म स्वरूप हो जाती है । आत्मा के विषय पे समस्त शाश्त्रों दवारा लिखित है । रामचरित मानस में तुलसीदासज़ी ने लिखा ईश्वर अंश जीव अविनाशी।

शब्द :
           शब्द वह डोर है जिसकी धुन पकड़ कर सुरत परमेश्वर तक पहुचती है । यह परमेश्वर के दो निर्गुण रूपों ( शब्द / नाद और प्रकाश)  में से एक है  ।

योग:
            योग एक क्रिया है जिसका अर्थ है जोड़ना । परमात्मा से आत्मा के मिल कर एक हो जाने की क्रिया को योग कहते है ।

राधास्वामी का शाब्दिक अर्थ : 
       राधा का तात्पर्य आत्मा से है और आत्मा का स्वामी परमात्मा है । अतएव राधास्वामी वास्तव में परमात्मा का ही
सम्बोधन है ।

ईश्वर की विवेचना :
        ईश्वर के बारे में सन्त मत कहता है  " अकह अपार अगाध अनामी, सो मेरे प्यारे राधास्वामी " ।